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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
मनश्च प्रथितं राजन्पञ्चेन्द्रिय़समीरणम् |  ५५   क
एष लोकनिधिर्धीमानेष लोकविसर्गकृत् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति