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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्रापि स विजानाति पुरुषं व्रह्मवर्तिनम् |  ६५   क
नाराय़णपरो मोक्षस्ततो वै सात्त्विकः स्मृतः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति