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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
पश्यत्येनं जाय़मानं व्रह्मा लोकपितामहः |  ७२   क
रजसा तमसा चैव मानुषं समभिप्लुतम् ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति