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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा समुद्रात्प्रसृता जलौघा; स्तमेव राजन्पुनराविशन्ति |  ७७   क
इमे तथा ज्ञानमहाजलौघा; नाराय़णं वै पुनराविशन्ति ||  ७७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति