अनुशासन पर्व  अध्याय १४

उपमन्युरु उवाच

नमस्ते कृष्णवासाय़ कृष्णकुञ्चितमूर्धजे |  १५२   क
कृष्णाजिनोत्तरीय़ाय़ कृष्णाष्टमिरताय़ च ||  १५२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति