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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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जनमेजय़ उवाच
साङ्ख्यं योगं पञ्चरात्रं वेदारण्यकमेव च |  १   क
ज्ञानान्येतानि व्रह्मर्षे लोकेषु प्रचरन्ति ह ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति