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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
प्राप्ते प्रजाविसर्गे वै सप्तमे पद्मसम्भवे |  १७   क
नाराय़णो महाय़ोगी शुभाशुभविवर्जितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति