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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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जनमेजय़ उवाच
किमेतान्येकनिष्ठानि पृथङ्निष्ठानि वा मुने |  २   क
प्रव्रूहि वै मय़ा पृष्टः प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति