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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
का शक्तिर्मम देवेश प्रजाः स्रष्टुं नमोऽस्तु ते |  २१   क
अप्रज्ञावानहं देव विधत्स्व यदनन्तरम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति