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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वरूपिणी ततो वुद्धिरुपतस्थे हरिं प्रभुम् |  २३   क
योगेन चैनां निर्योगः स्वय़ं निय़ुय़ुजे तदा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति