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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिंस्तु वै सुसंवृत्ते दुर्लभे परमप्रिय़े |  २२   क
इह कामानवाप्नोति प्रत्यक्षं नात्र संशय़ः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति