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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
तां चैव प्रकृतिं प्राप्य एकीभावगतोऽभवत् |  २८   क
अथास्य वुद्धिरभवत्पुनरन्या तदा किल ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति