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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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श्रीभगवानु उवाच
यं मानसं वै प्रवदन्ति पुत्रं; पितामहस्योत्तमवुद्धिय़ुक्तम् |  ४७   क
वसिष्ठमग्र्यं तपसो निधानं; यश्चापि सूर्यं व्यतिरिच्य भाति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति