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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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श्रीभगवानु उवाच
तस्यान्वय़े चापि ततो महर्षिः; पराशरो नाम महाप्रभावः |  ४८   क
पिता स ते वेदनिधिर्वरिष्ठो; महातपा वै तपसो निवासः |  ४८   ख
कानीनगर्भः पितृकन्यकाय़ां; तस्मादृषेस्त्वं भविता च पुत्रः ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति