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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः |  १२१   क
सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ||  १२१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति