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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो व्रह्मणः सुतः |  ६२   क
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति