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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
निःसंशय़ेषु सर्वेषु नित्यं वसति वै हरिः |  ६६   क
ससंशय़ान्हेतुवलान्नाध्यावसति माधवः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति