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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्यं च योगं च सनातने द्वे; वेदाश्च सर्वे निखिलेन राजन् |  ६८   क
सर्वैः समस्तैरृषिभिर्निरुक्तो; नाराय़णो विश्वमिदं पुराणम् ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति