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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्राध्यात्मगतिं देव एकाकी प्रविचिन्तय़न् |  १०   क
वैराजसदने नित्यं वैजय़न्तं निषेवते ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति