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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः खान्निपपाताशु धरणीधरमूर्धनि |  १२   क
अग्रतश्चाभवत्प्रीतो ववन्दे चापि पादय़ोः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति