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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्ते कुशलं पुत्र स्वाध्याय़तपसोः सदा |  १५   क
नित्यमुग्रतपास्त्वं हि ततः पृच्छामि ते पुनः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति