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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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वैशम्पाय़न उवाच
वहवः पुरुषा लोके साङ्ख्ययोगविचारिणाम् |  २   क
नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति