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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षीरोदस्य समुद्रस्य मध्ये हाटकसप्रभः |  ९   क
वैजय़न्त इति ख्यातः पर्वतप्रवरो नृप ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति