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शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
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व्रह्मो उवाच
यत्तत्कृत्स्नं लोकतन्त्रस्य धाम; वेद्यं परं वोधनीय़ं सवोद्धृ |  १६   क
मन्ता मन्तव्यं प्राशिता प्राशितव्यं; घ्राता घ्रेय़ं स्पर्शिता स्पर्शनीय़म् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति