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शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
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व्रह्मो उवाच
द्रष्टा द्रष्टव्यं श्राविता श्रावणीय़ं; ज्ञाता ज्ञेय़ं सगुणं निर्गुणं च |  १७   क
यद्वै प्रोक्तं गुणसाम्यं प्रधानं; नित्यं चैतच्छाश्वतं चाव्ययं च ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति