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वन पर्व
अध्याय ६६
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वृहदश्व उवाच
तां प्रहृष्टेन मनसा दमय़न्ती विशां पते |  १५   क
अभिवाद्य मातुर्भगिनीमिदं वचनमव्रवीत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति