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वन पर्व
अध्याय २९१
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सूर्य उवाच
भविष्यति महावाहुः कुण्डली दिव्यवर्मभृत् |  १८   क
उभय़ं चामृतमय़ं तस्य भद्रे भविष्यति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति