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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
मिञ्जिकामिञ्जिकं चैव मिथुनं रुद्रसम्भवम् |  १५   क
नमस्कार्यं सदैवेह वालानां हितमिच्छता ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति