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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
ततः स पाण्डवानीके जनय़ंस्तुमुलं महत् |  १   क
व्यचरत्पाण्डवान्द्रोणो दहन्कक्षमिवानलः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति