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शान्ति पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वष्ट्रेव विहितं यन्त्रं यथा स्थापय़ितुर्वशे |  १०   क
कर्मणा कालय़ुक्तेन तथेदं भ्राम्यते जगत् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति