शान्ति पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप |  २०   क
धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेय़ं विपश्चिता ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति