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शान्ति पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
यो हि पापसमारम्भे कार्ये तद्भावभावितः |  २३   क
कुर्वन्नपि तथैव स्यात्कृत्वा च निरपत्रपः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति