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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
अर्धं मम शरीरस्य सर्वलोकपितामहः |  ३८   क
अहं नाराय़णो नाम शङ्खचक्रगदाधरः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति