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शान्ति पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं त्वमिह सङ्क्रान्तो विक्रमेण वसुन्धराम् |  ३०   क
निर्जिताश्च महीपाला विक्रमेण त्वय़ानघ ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति