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वन पर्व
अध्याय २३०
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वैशम्पाय़न उवाच
भज्यमानेष्वनीकेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वशः |  २५   क
कर्णो वैकर्तनो राजंस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति