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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
पताकिनं वज्रनिपातनिस्वनं; सिताश्वय़ुक्तं शुभतूणशोभितम् |  ५८   क
इमं समास्थाय़ रथं रथर्षभं; रणे हनिष्याम्यहमर्जुनं वलात् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति