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अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
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भीष्म उवाच
व्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितव्रतम् |  ४   क
वासय़ेत गृहे राजन्न तस्मात्परमस्ति वै ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति