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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
भाजनानि च लौहानि पात्रीश्च विविधा नृप |  १४   क
यद्यदिच्छति यावच्च यदन्यदपि काङ्क्षितम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति