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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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दुर्योधन उवाच
यो हि मित्रमविज्ञाय़ याथातथ्येन मन्दधीः |  २९   क
मित्रार्थे योजय़त्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति