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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स तमभ्यर्च्य राजानं नाम संश्राव्य चात्मनः |  १८   क
निषीदेत्यभ्यनुज्ञातो वृस्यामुपविवेश ह ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति