आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

नवं तु विष्टरं कौश्यं कृष्णाजिनकुशोत्तरम् |  २५   क
प्रतिपेदे तदा व्यासस्तदर्थमुपकल्पितम् ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति