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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यवृहस्पती |  ८७   क
एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति