वन पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

यां न कृष्णो न वीभत्सुर्नाभिमन्युर्न सृञ्जय़ः |  १२   क
न चाहमभिनन्दामि न च माद्रीसुतावुभौ ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति