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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मनुष्या हि निर्वेदमफलं सर्वघातिनम् |  १४   क
अशक्ताः श्रिय़माहर्तुमात्मनः कुर्वते प्रिय़म् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति