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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा धर्मनित्यं तु पुरुषं धर्मदुर्वलम् |  २२   क
जहतस्तात धर्मार्थौ प्रेतं दुःखसुखे यथा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति