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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य धर्मो हि धर्मार्थं क्लेशभाङ्न स पण्डितः |  २३   क
न स धर्मस्य वेदार्थं सूर्यस्यान्धः प्रभामिव ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति