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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य चार्थार्थमेवार्थः स च नार्थस्य कोविदः |  २४   क
रक्षते भृतकोऽरण्यं यथा स्यात्तादृगेव सः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति