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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्धर्मार्थय़ोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिताः |  २८   क
प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्यारणिर्यथा ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति