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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रव्यार्थस्पर्शसंय़ोगे या प्रीतिरुपजाय़ते |  ३०   क
स कामश्चित्तसङ्कल्पः शरीरं नास्य विद्यते ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति