वन पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

अर्थार्थी पुरुषो राजन्वृहन्तं धर्ममृच्छति |  ३१   क
अर्थमृच्छति कामार्थी न कामादन्यमृच्छती ||  ३१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति